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बाबु लाल वर्मा
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श्री बाबू लाल वर्मा का जन्म 1919 में देवास में हुआ । उन्होंने तीन वर्ष की उम्र से अपने पिता जवाहर शास्त्री से ढोलक सीखना प्रारम्भ किया । बाद में वे प्रसिद्ध तबला वादक स्व जहाँगीर खाँ साहेब   (राष्ट्रपति पुरुस्कार प्राप्त) से बीस वर्ष तक सीखते रहे । श्री वर्मा आकाशवाणी को अंठोणी के कलाकार होकर उन्होंने व्रहमवाद्य नामक बाद्य का आविष्कार भी किया तथा कई प्रमुख शहरों में तथा कई जाने माने संगीतकारों के समक्ष  व्रहम बाद्य को लोकप्रिय बनाने हेतु कार्यक्रम भी प्रस्तुत किये । उन्होंने गहरी लाल (तेरा मात्रा),(चौसट बीट) एवं त्रींग ताल (तेरा मात्रा) की रचना की है ।

 व्रहम बाद्य संगीत जगत में एक नया आविष्कार है परन्तु यह अल्प ज्ञात ही रहा ।  व्रहम बाद्य ढोलक एवं तबला के मेल से बना लाल बाद्य है जिसका नाम ब्रम्ह देव के नाम पर रखा गया है । ब्रम्ह बाद्य में चार सतह है जिन पर ताल दी जा सकती है । यह बाद्य तबला एवं ढोलक से अधिक प्रभावी ध्वनि उत्पन्न करता है बह बाद्य की ध्वनि में पखावज (मृदंग ) दुदुर, कुंडी, नक्कारा, डमरूढोलक त्रिपुस्कर एवं तबला जैसे ताल वाद्यों का विकल्प भी हो सकता है ।